सरकार द्वारा समस्त योजनाओं में इनके लिये बजट का तीस फ़ीसदी हिस्सा सुरक्षित किया जाता है और राज्यों को उसके अनुपालन के लिये गजट प्रकाशित कर दिया जाता है.कितने ही एन.जी.ओ.इस आबंटित राशि को गरीबों तक पहुँचाने का बेडा उठाते हैं.
ससंद /विधान सभा मे सासंदों /विधायका द्वारा इन गरीबों की चर्चा पर कुल समय का चालीस फ़ीसदी समय लगाया जाता है. इन्हीं चर्चाओं को करते करते पाँच साल व्यतीत हो जाते हैं.
फ़िर चुनाव आते हैं और गरीब फ़िर मैदान मे आज़ाता है.उससे किसी ने भी नहीं पूँछा,क्या हुआ,कैसे हो.
वोट डलवाने के लिये लठैत,बन्दूकधारी इनके आगे पीछे घूमने लगते हैं.यही गरीब चालीस फ़ीसदी वोट डाल कर सरकार की स्थापना करते हैं,बाकी लोग जो वोट का इस्तेमाल नहीं करते ,इनके हाल का बखान ,नंगी धडंगी फ़ोटो के साथ, पेपर ,मेगजीन में करके अपनी जेबें भरते रहते हैं.
शायद ही किसी अन्य देश में ऐसा गरीब नहीं बिकता होगा,जैसा कि इस देश में बिकता है,चाहे पिपली लाइव या लगान,स्ल्मडोग,आदि आदि, सब गरीबों के ही जीवन पर बनते हैं और धडल्ले से बिक कर,एवार्ड से नवजते हुये, अमीरों की झोली में समा जाते हैं.
देश में पंचायत राज की स्थापना भी हो गयी,व्यवस्था भी कायम हो गयी.सीटे भी आरक्षित हो जाती हैं,चुनाव भी गरीब लडते हैं,लेकिन दमदार पार्टियों के दम खम पर,वही चुनाव पर खर्च करते है.यहाँ भी गरीबों को दिय गये अनुदान पर इन्ही पार्टियों का हक होता है,गरीबों का नहीं.
अब गरीब को गरीब कहना छोड दो,वह अब ज्यादा दिनों वे तक जीवित नहीं रह सकते,उनका वर्चस्व समाप्ति पर है.