भ्रष्टचार धर्म है ,या अधर्म कौन परिभाषित करेगा.जो कर रहे हैं ,वह कहेगे कि धर्म है, जो नही कर रहे या नहीं कर पा रहे हैंवह कहेंगे अधर्म है.यह धन कमाने का एक तरीका है,किसी की जेब से नहीं जाता,आकाशीय मार्ग से विद्युत गति से आता हैऔर जेब के माध्यम से जमीन मे गड जाता है.अब चूना किसको लगा है,कहते हैं कि देश को नुकसान हुआ.जनता भूख से मर जाती है,किसका नुकससान हुआ ?
भ्रष्टाचार के जीन्स पैदायसी होते हैं.हाथ मे धन की लकीर होती है,धन बेयीमानी ,चोरी , डकेती और हेराफ़ेरी से ही ज्यादा कमया जा सकता है,ईमानदारी से नहीं.ईमानदार सिर्फ़ रोटी दाल आराम से खा सकता है,मकान लोन से बनाता है, ,शादी,बच्चों की शिक्षा ,उधारी से ही बनाता है.भ्रष्टाचार उसके लिये अधर्म है.क्योकि वह गीता,कुरान बाइबिल,गुरुग्रंथ से यही शिक्षा ग्रहण करता है,भ्रष्टाचारी भी इन्ही सब को पढते है,लेकिन वह अपना अलग अर्थ निकालते हैं.
कोई नृप होय हमे का हानी-चेरी छाँणि न कहावउँ रानी.यही संतोष धन है.
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